anandbarun

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  • anandbarun 2d

    @ajnabi_abhishek #rachanaprati102
    प्राक्कथन: जीवन कितना विकट संयोग है जिसका हमें सच में कोई भान नहीं है। बिल्कुल एक ऐसे स्तम्भ जैसा जो तलवारों को एक दूजे की धार पर संतुलित कर के खड़ा किया गया हो। किसी भी कारक का छुद्रतम व्यवधान - और सबकुछ छिन्न-भिन्न। हम इसका महत्व और उद्देश्य समझें। पर हमारा मन कितना चंचल है जो हमारी चेतना को सतत भरमाता रहता है। मेरी यह रचना इन विरोधाभास को अंतर्हित कर समझने का तुच्छ प्रयास है।

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    संयोग

    सुध, चेतना के द्वारे
    अहिर्निशि सुप्त, जागे
    सचेत, अवचेतन में
    धवल, घन से बरसे
    उर्ध्व प्राण, अंतर कैसे
    अमिट, शुन्य जीवन में
    विलग, आलिंगन जैसे
    अपरिचित, परिजन में
    गुण, निर्गुण बसे
    कैसे बताऊँ तुम्हें
    तुम कहीं से आए न थे
    फिर कैसे हो संग ऐसे
    अर्चना अंतर पट उगे
    दृग खोलूं, जो निसरे
    प्रेयसी अज्ञात अहे
    बस भूला है जग रे...
    ©anandbarun

  • anandbarun 4d

    जीवनसाथी

    ईट-पत्थर चिना मेरा मकां, जो रहता जहाँ मैं
    वही घर है तू।
    भले मगन सहज ठिठोली, जो मन बिहँसता है
    वही हर्ष है तू।
    होता हूँ आहत विवशता में, जो संग जला है
    वही सखा है तू।
    स्वाद रचता सदा से, जो जीवन में जगा है
    वही पोषण है तू।
    भ्रमर मेरे मन का, जो रमता जहाँ पर है
    वही बगिया है तू।
    रंगों की अठखेलियां, जो निखरी सगर है
    वही उमंग है तू।
    जीवन का परिचायक, जो तपिश बना है
    वही उष्मा है तू।
    राग सजगता का हरपल, जो खनकाता रहा है
    वही चूड़ियाँ है तू।
    उभरता रहा बंद पलकों, जो अभ्यर्थना में
    वही मूरत है तू।
    छू जाती जगा, जो अंतर्मन तक सिहरा है
    वही स्पर्श है तू।
    रूक जाए ठिठक कर, जो तू ना दिखा है
    वही साँस है तू।
    ©anandbarun

  • anandbarun 5d

    बॉबी

    वह अब भी नादान रह गई
    पापा के गले कसती
    नन्हीं सुकोमल बाँहों का हार
    माँ से जिद करती बार-बार
    बनी सहोदरों का उपहास
    ला दो ना माँ पा
    सपनों का एक राजकुमार
    मनहर, साँसे भरता, हँसता-खेलता घर
    बसती हरियाली सगर
    रहती कामनाओं की चहल-पहल
    दौड़ती नंगे पाँव, खुशियाँ इधर-उधर
    भरा-पूरा, मनोक्लेश से अंजान,
    अंतर चार दीवार
    घर आँगन ड्योढ़ी और द्वार
    कुआँ, बाग व मेढ़ों पर पगडंडियाँ
    छोटे-बड़े पेड़, कैक्टस, फूलों की क्यारियाँ
    सम्मोहन झूमते राधाचूड़ा का
    अमिट यादों का छोटा सा संसार।
    जिंदगी दोहरी आयाम में थम गई
    अटक गई कहीं अनुत्तरित
    प्रश्न बनकर जीवन बढ़ती चली।
    पर अब भी अपनी नादानी जी लेती
    अपने अनगढ़े सपनों में है जगती।
    अब बच्चों की माँ बन गई
    फारिग हो, भूले से अब भी,
    खुलकर अबोध हँस लेती
    कभी अनायास अश्रु की पनारे बहती।
    छूट गया है सबकुछ फिर भी
    बसी है अंतर जीती जगती
    वह दुनियाँ अब भी है वैसी
    हृदय में अब तक उसाँसें भरती
    धडकनों में दस्तक देती
    सच्चे सुख की जाग्रत स्वप्न बनी
    वह अब भी नादान रह गई
    अक्सर जब-तब वैसी ही खिलती
    वक्त जैसे वहीं कहीं, ठहर कर रह गई...
    (मेरी सहधर्मणी को सहृदय समर्पित)
    ©anandbarun

  • anandbarun 1w

    ✍️COLLAB✍️

    With Gauri Sharma
    चाहत में डूबने का हक सभी को है
    पर दुनिया के सामने इनकार सभी को है
    बेशक कोई छुपा ले दिल की गहराइयों में
    पर किसी न किसी से तो प्यार सभी को है
    ©_gourisharma

    सतरंगे सपनों सा चाहत जगमगाता है
    ग़र, दिल का दर्पण साफ झलकाता है
    जब भी प्यार बयाँ होने में सकुचाता है
    हमारा सत्व, कहीं दफ़्न होता जाता है
    ©anandbarun

  • anandbarun 1w

    ट्यूब लाईट

    लिखता हूँ सहज भावनाऐं
    कविता का तो नहीं पता।
    चलता हूँ सीधी राह पर
    अपनी चाल का भी नहीं पता;
    मगन नाचते भला क्या पता
    अब आंगन है टेढ़ा या सीधा।
    फब्तियाँ कसते नहीं थकते
    अब तेरी आँखों में है क्या अड़ा।
    भागती हरणियों को क्या पता
    अपना इलाका कब पार निकला,
    शिकारियों ने कहाँ जाल बिछाया
    एक अबोध को मालूम ही क्या;
    कब तक उसकी है साँसें बची
    उसे भी अब, कुछ कहाँ पता।
    पर पता है, अंत होने में मेरा
    अभी लगेगी देर और क्या पता
    बचे ना शायद, तेरा ही ठिकाना।
    आओ मिल चंद घड़ी दुआ कर लें
    फैला लो अपने दामन और
    और सोच का ज़रा दायरा।
    मानता हूँ, हूँ गुनहगार सबका
    पता है, करता अनजाने गलतियाँ,
    जो कमियों का है भारी बस्ता।
    पर, पता है जीने का सिला
    ढूंढ लूंगा इक दिन, अपना वास्ता
    पत्तों पर ढुलमुल यह काया
    पता नहीं कीचड़, है कितना कहाँ
    पर यकीं से इक दिन खिलेगा
    सृजन का पावन कमल यहाँ।
    ©anandbarun

  • anandbarun 1w

    शतकीय रचनाप्रति

    सच मानिए यह मेरे लिए कितना आसान रहा
    एक से बढ़कर एक कृतियों से मोतियाँ चुगना

    @piu_writes
    ...इस पल की परवाह कर ले बंदे
    यही पल तेरा है...

    @goldenwrites_jakir
    ...रख कर जुबां पर मुस्कान
    हर इक गम को भुला दें ज़रा...

    @suresh_28
    ...वर्तमान की खुशियाँ खोके
    क्यों रोना भविष्य का...

    @anusugandh
    ...आज में जी ले, आज ही है अनमोल
    जो बीत गया, अब उसका क्या है मोल...

    @psprem
    ...इस में ही सुख का डेरा
    जब तुम जागो तभी सवेरा...

    @loveneetm
    ...वर्तमान का ध्यान कर, भविष्य का कर निर्माण
    तब ही जग मंजिल मिले, मिले जगत सम्मान...

    बताऐं अब आप ही, है यह कितना आसान
    किसी एक को चुन लेना क्या होगा आसान
    बट्टी कर लेते हैं अब, करें लौटरी है आसान
    शतकीय रचनाप्रति की पारी पियु पर जाती

    @piu_writes कृपया #rachanaprati100 का संचालन भार करें स्वीकार
    ©anandbarun

  • anandbarun 1w

    जिंदगी

    आए बेदाग़
    सभी पन्ना कोरा।
    कमबख़्त,
    बचते - बचाते
    ज़िंदगी ने,
    फिर, क्या, क्या
    सिखा दिया।
    बनते हैं मासूम
    अब भी,
    पर, इक दराँती
    सब ने कैसा,
    है ये अंदर
    छिपाया हुआ।
    ©anandbarun

  • anandbarun 1w

    सफर ..

    क्यूँ रुक गये हो
    जो कुछ टूट गये हो
    अब रहने भी दो
    समेट ना पाओगे
    उन बीते पलों को;
    जो बँट गये हो
    इतने हिस्सों में,
    चुका न पाओगे
    इनकी किस्तों को;
    रहने दो यादों को
    टिमटिमाते राहों में,
    अभी अधूरा सफर है
    चलना लंबी डगर है,
    कल की परछाईयों में
    जीना एक भँवर है।
    घुटन की हद के
    ज़रा परे देखना तो
    अंधेरों के आगे
    जो अरूणिमा है
    क्षितिज के परे वो
    इक खुला आसमां है
    पुकारता रहा तुम्हें
    वहीं तेरा जहाँ है
    जो बताता पता है
    वो सुत्र वर्तमान है
    खुद को ढूंढ़ पाओगे
    वहाँ, वहीं तेरा मकाँ है।
    ©anandbarun

  • anandbarun 1w

    #rachanaprati99 #rachanaprati98

    हम सुकून की तलाश में न जाने कितने पल व्यर्थ गवा देते हैं। मित्रगण हम जिन खुशियों का इंतजार करते रहते हैं वो है इसी पल में।
    तो लीजिए, उठाईये कलम और उकेड़ दीजिए अपने मन में आ रहे विचारों को इसी पल....विषय है 'वर्तमान में जीना'

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    वर्तमान में जीना

    'कहाँ रख दी शामें, कहाँ रख दी सहर।'
    ©neerajtripathi

    भींच मुट्ठियों में, दौड़ता रहा था बेखबर
    कि सफर के मध्यान्ह में कभी रुक कर
    निश्चिंत हो सुकून से उन पलों के सुखन
    जी लूँगा उनकी खुशबुओं को मुक़म्मल
    समय के रिसते रेत ना ठहरे कभी मगर
    कहाँ रख दी शामें, कहाँ रख दिए सहर
    ©anandbarun

  • anandbarun 1w

    जीवन में मुस्कान

    हर पल की विवेक और संयम से
    होता है हर अपना सपना साकार
    धीरता और ध्रुव निरंतरता ही में
    बसता रहा है सुकून का व्यापार
    कभी सफलता की बुर्ज पे भी बैठे
    अक्सर मिलता नहीं मनचाहा स्वाद
    अनन्तर निरत संघर्षों के अंतरे ही में
    निहित होता है आनन्द का पारावार
    विषमताओं की अंतहीन सिलसिले
    गढ़ते हैं अवसर चढ़ने को पायदान
    सुख का कोई धाम नहीं है, वह उगे
    जब भी हमारे पग उठे आगे हरबार
    व्यर्थ प्रलाप में कमियों को गिनते
    असल का व्यय कर देते अनायास
    रात में खिलने को जो होते हैं बदे
    वो दिन को क्यूँ कोसते थकें बेजार
    कमल, गुलाब, हरश्रृंगार और बेलें
    भिन्न हैं सबके ऋतु-रंग-रूप-आचार
    अन्यथा नहीं कुछ भी यहाँ रहता है
    'जहाँ काम सुई के, कहाँ करे तलवार'
    परिवर्तनशील जग मे प्रतीत व्यर्थ से
    समय से लेते अनुपम रूप व आकार
    जो हम यह सारा रहस्य समझ सकें
    असीम रहे हमारे जीवन की मस्कान
    ©anandbarun