akankshanandan066

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  • akankshanandan066 78w

    प्रेमचंद जयंती की सभी हिंदी प्रेमियों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई। ������

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    ©akankshanandan066

  • akankshanandan066 78w

    दिन भर की थकन से मैं चूर थी
    देख तस्वीर,यादों में उनकी मगरूर थी
    एक चाह थी उनसे हाल-ए-दिल बयां करने की
    रात के अंधेरे में मुखातिब हुए
    लेकिन वक्त का कहर तो देखो
    ना वो हमें देख सके
    ना हम उन्हें देख सके।।
    ©akankshanandan066

  • akankshanandan066 80w

    खिड़की

    उस शाम
    जब मैं बैठी थी
    अपने कमरे की
    खिड़की के पास
    अचानक एक हवा का झोंका आया
    कुछ इस तरह....

    मानो वह हवा कह रही हो
    भूल कर अपनी कुंठाओं को
    आज के लिए जियो
    कुछ इस तरह..

    छोड़ संसार की मोह माया को
    छोड़ स्वार्थ की दुनिया को
    तू जी ले इस हवा में
    कुछ इस तरह...

    इस संसार में कौन अपना कौन पराया
    यहां तो सब दिखावा है
    सब कुछ भूल कर
    सपनों को अपने पूरा कर
    कुछ इस तरह...

    सूरज की लालिमा को देख
    मेरा मन भी
    जगमगा उठा
    कुछ इस तरह....

    आशा की लहर मन को
    उज्वलित कर उठी
    कुछ इस तरह...

    खुली खिड़की के पास बैठ
    सकारात्मक ऊर्जा के साथ
    मैं जीने लगी
    कुछ इस तरह...!!
    ©akankshanandan066

  • akankshanandan066 80w

    वास्तविक खूबसूरती
    #Abhivyakti21
    @happy81ji

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    तुम सुंदर हो तो क्यों
    अपने चेहरे को सजाने के लिए
    बिंदी,लाली,पाउडर लगाती हो

    अपनी वास्तविक खूबसूरती को छुपाकर
    चेहरे पर एक नया चेहरा लगाती हो
    जब तुम सुंदर हो
    तो क्यों बाहर जाने से डरती हो

    तुम सुंदर हो तो क्यों फिल्टर कर
    अपनी तस्वीरों को बदलती हो
    तुम सुंदर हो
    मैल नहीं तुम्हारे मन में
    तो क्यों चमकती कार को देखकर आकर्षित होती हो

    एक लड़का जो तुम्हारे पीछे है
    तुम उसे एकटक देखती तक नहीं
    क्योंकि वह दिखने में साधारण है
    लेकिन उसके मन में खोट नहीं है
    फिर भी वह तुम्हें भाता नहीं

    तुम्हारी नजरें उस लाल गाड़ी पर ही टिकी है
    जिसमें एक लड़का
    नीला चश्मा लगाकर निकलता है
    शरीर भी पहलवानों जैसा है
    तुम्हारी नजरें उससे एक पल भी नहीं हटती

    क्योंकि तुम उसकी ऊपरी खूबसूरती को देखकर
    उससे मन ही मन प्यार कर बैठी हो
    फिर क्यों दोष देती हो किसी एक को
    जब तुम खुद,
    एक मुलाकात में ही
    खुद को उसके आगोश में समर्पित कर देती हो
    और मोतियों की भांति टूट जाती हो
    तो फिर क्यों एक तरफा इल्जाम लगाती हो

    दोषी वह नहीं जो शोषण करता है
    दोषी वह है जो शोषित होता है
    ऊपरी सुंदरता को देखकर कायल हो
    सच्चे प्यार को नकारता है।
    ©akankshanandan066

  • akankshanandan066 80w

    परहित

    हे! इंसा मुझे इतना बता
    तू क्यों उदास यहां बैठा है

    सेवा पानी छोड़ कर सबकी
    स्वार्थ हितों में क्यों जीता है

    स्वर्ग नर्क की बात हो गर तो
    तू पत्थर पर भेंट खूब चढ़ाता है

    बात आए जब दीन-दुखियों की तो
    क्यों कदमों को पीछे तू कर लेता है

    कभी रूप तू अपना परहित दिखा,
    छल कपट कर जनता को ठगता है

    दान धर्म के नाम पर
    फलों में बम भर जानवरों को भी मार गिराता है

    कैसा रूप है तेरा यहां कुरूप
    जो हित ना किसी का चाहता है

    हे! मानव तू सुन ले आज
    परहित के हैं निहित परिमाप

    निज कष्टों को जो अपनाता है
    वही मानव श्रेष्ठ कहलाता है।।
    ©akankshanandan066

  • akankshanandan066 80w

    लिख दिया मैंने
    चंद शब्दों में अपनी मौत को
    लिख जिसे कलम भी मुझसे रूठ गई
    रखी थी यहीं पास में
    न जाने कहां खो गई।।
    ©akankshanandan066

  • akankshanandan066 80w

    विदाई

    मैं चैन की नींद सो रही थी
    मेरे पास बैठकर ना जाने क्यों
    मेरी मां रो रही थी

    आसपास लोगों की भीड़ थी
    कोई दीया तो कोई अगरबत्ती
    तो कोई फूल मंगा रहा था

    कुछ परिचत तो कुछ
    अपरिचित चेहरे दिख रहे थे
    दीवार पर सिर पटकते मेरे
    भाई भी रो रहे थे

    मुझे कुछ समझ ना आ रहा था
    क्यों मुझे
    नहला धुला कर
    सफेद चादर से ढका जा रहा था??

    मेरी मां जमीन पर सिर
    पटकती चिल्ला रही थी
    छोटी नन्ही भतीजी भी
    उंगलियां मेरी पकड़ रही थी

    खुशियों भरे घर में
    अंधेरा सा छा गया था
    क्या हुआ कैसे हुआ पूछ रहे थे लोग
    नहीं रही इस दुनिया में मेरी बच्ची
    मेरी मां द्वारा बताया जा रहा था

    अब सब समझ मुझे आ रहा था
    मेरे ना रहने का दुख सभी को खा रहा था
    मैं तो सो रही थी बड़े चैन से
    मुझे हिला डुला बार-बार
    उठाया जा रहा था

    मुझे मेरे पापा के पास
    ले जाया जा रहा था
    मुझे पकड़ती मेरी मां की बांहों से
    दूर किया जा रहा था

    होनी को कौन टाल सकता है
    धीरज रखो बहन.....
    कहकर ऐसा,मां को मेरी
    समझाया जा रहा था

    चढ़ा कफ़न,डाल कर माला
    मुझे कंधों पर ले जाया जा रहा था
    लेकर श्मशान मुझे
    लकड़ी के बिस्तर पर लिटाया जा रहा था

    उदास चेहरा देखकर मेरा
    परेशान हो उठते थे भाई मेरे
    आज उन्हीं के हाथों से
    इस दुनिया से विदा
    मुझे किया जा रहा था।
    ©akankshanandan066

  • akankshanandan066 81w

    रिश्ते

    इंसानों की दुनिया में
    मैं रिश्तों को पहचान गई

    होते हैं सब अपने ही
    तो क्यों फिर सबसे दूर हुई

    जात-धर्म का ना काम यहां
    तो क्यों दुनिया मत-भेदो से भर गई

    प्रेम जोड़ता हर रिश्ते को
    तो क्यों अहम में इंसानियत कहीं खो गई

    क्या होते हैं ये रिश्ते
    जानवरों से जिंदगी है अब सीख रही

    भाषा न है कोई उनकी
    फिर भी पूंछ है अपनी हिला रही

    भेदभाव ना जलन किसी में
    निस्वार्थ भाव का गीत हर चिड़िया है गा रही

    प्रेम भाव के हैं रिश्ते तो
    क्यों रिश्तो में बेईमानियां आज हो रही??
    ©akankshanandan066

  • akankshanandan066 81w

    जो सहता है वही कहता है
    जो सुनता है वह चुप ही रहता है।।
    ©akankshanandan066

  • akankshanandan066 81w

    ओजस्विनी

    हाव भाव स्पष्ट हो
    हीन भाव नष्ट हो
    ओज गुण को तुम
    जरा निखार दो

    आवाज में दहाड़ हो
    पथ में जो पहाड़ हो
    शौर्य से उसे तुम
    मिटा सको

    शूर हम बनें यहीं
    क्रूर से डरे नहीं
    बाजुओं से शत्रु को
    पछाड़ दो

    विघ्न से डरे नहीं
    यत्न हम करें सभी
    सबका यहां हृदय
    शक्तिमान हो

    स्वयं पर अभिमान हो
    जब जंग का ऐलान हो
    वीरता का तुम यहां
    प्रमाण दो

    शत्रुओं की हार में
    सबके बलिदान में
    ध्वज तिरंगा
    यहां तुम गाड़ दो।।
    ©akankshanandan066