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  • abhi_mishra_ 1d



    तेरे इश्क़ में मुसलसल, मुक़म्मल हो रहा हूँ,
    था कल, फ़िर मैं आज, फ़िर कल हो रहा हूँ।

    जो तुझ पर लिखी है, जो तुझ से बनी है,
    मैं तेरी कहानी, अमल हो रहा हूँ।

    ना जन्मों के वादे, ना सदियों के किस्से,
    इन्हीं चंद घड़ियों का पल हो रहा हूँ।

    जो माथे पर लिपटी है, बातों में दिखती है,
    अब हर उस शिकन का, मैं हल हो रहा हूँ।

    मोहब्बत में लाज़मी है, हुनर मात खाने का,
    मैं हर उस हुनर में सफ़ल हो रहा हूँ।

    ©abhi_mishra_

  • abhi_mishra_ 5w



    कहने को काफ़ी एक लफ्ज़ ही मुक़म्मल,
    लिखने जो बैठूँ, तो जहां कम है।

    ©abhi_mishra_

  • abhi_mishra_ 5w



    एक ज़िम्मा है जो गहरा है,
    एक ख़्वाब है जो ख़ाली है।

    मुझे डर है तो बस झरोखों से,
    मैंने तूफां में कश्ती संभाली है।

    ©abhi_mishra_

  • abhi_mishra_ 6w

    तुम्हारी समझदारी और मेरे पागलपन के बीच की जो महीन रेखा है उसी का नाम प्रेम है।
    जब हम उस रेखा पर होते हैं तो सब कुछ सुनहरे सपने जैसा प्रतीत होता है।
    हम साथ हंसते हैं, साथ मुस्कुराते हैं, एक दूसरे के प्रति समर्पित रहते हैं।
    लेकिन उस महीन रेखा के दोनो ओर जो जाल है उसमें फंस कर शायद ही कोई खुशी से रह पाया हो, क्योंकी प्रेम में ना तो समझदारी चलती है ना ही पागलपन।
    रेखा के इस ओर यह महज़ एक पागलपन है, रेखा के उस ओर केवल समझदारी।
    समझदार व्यक्ति प्रेम सिर्फ़ तब तक ढूँढता है जब तक उसे प्रेम की आवश्यकता हो, और पागलपन में तो प्रेम को पीड़ा बनने में अधिक समय नहीं लगता।
    या फ़िर यूँ कहो कि प्रेम एक परिंदा है जो उड़ता फिरता है उस महीन रेखा के दोनो ओर।
    दिन भर वह कभी समझदारी में होता है तो कभी पागलपन में, लेकिन शाम को वह आकर बैठ जाता है उस रेखा पर जहाँ सब कुछ शांत और खूबसूरत है, और हर सुबह वह फिर निकल जाता है।

    मैं तुम्हें बताता हूँ विरह का कारण।

    जब वह परिंदा रोज़ उड़ता है, वह समय बिताता है या तो समझदारी में या पागलपन में।
    जब वह अधिक समय देने लगता है किसी एक तरफ़ (समझदारी या पागलपन) तो वह उस जगह का हो जाता है, वह शाम को लौटकर नहीं आता, और कभी आता भी है तो सिर्फ़ दूसरी तरफ़ का निरीक्षण करने।

    यही कारण है विरह का और यही कारण है कि या तो प्रेम आग है या फिर बैराग।

    तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि जब हम मिले, मैं भी समझदार हुआ करता था।
    लेकिन दोनो का रेखा के एक ही तरफ खड़ा होना प्रेम में मुमकिन नहीं है।
    हमारे लिए, मैंने रेखा के उस ओर जाना आवश्यक समझा।

    लेकिन, अब मैं हर शाम बैठता हूँ उस परिंदे की राह ताकते हुए, कि किसी शाम वह लौटेगा और मेरा इस ओर आना सार्थक होगा।
    मैं ख़ुद से कहानियाँ बनाता हूँ कि वह क्यों नहीं लौट रहा, उसकी क्या मजबूरियाँ होंगी, और मैं ख़ुद ही उन्हें मानने से इनकार भी कर देता हूँ।
    मैं चाहता हूँ कि या तो वह परिंदा लौट आए वहाँ जहाँ उसे होना चाहिए, या फिर मैं लौट आऊँ उस ओर जहाँ तुम हो, समझदारी है।

    लेकिन क्या अब उस ओर लौट पाना मुमकिन है?

    नहीं!

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    लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि क्यों मैं शून्य के पीछे भाग रहा हूँ?
    मैं उन्हें नहीं समझा सकता,

    क्योंकि वह समझदार हैं।

    ©abhi_mishra_

  • abhi_mishra_ 7w



    मेरे दिल में यूँ तो स्याह अँधेरा है,
    मगर तुम आ सको तो थोड़े तारे समेट लाना।
    रोशनी की थोड़ी कमी होगी,
    पलकों में शायद नमी होगी,
    रात शायद स्याह और काली होगी,
    पर वो ही मेरी चाँद रात, दिवाली होगी।
    उन तारों को यूँ ही बिखेर देना,
    जैसे पंछी को दाने सवेर देना।
    फिर जैसे सितारे रोशन होंगे,
    मेरे दिल के अँधेरे ओझल होंगे।
    अँधेरे के साथ चली जाएँगी यादें,
    तुम्हारी नहीं,
    उस वक्त की जो मैंने तुम्हारे बिना बिताया है।
    क्योंकि अँधेरा गवाह है मेरी कसक का,
    और गवाहों ने कब साथ निभाया है।

    ©abhi_mishra_

  • abhi_mishra_ 10w



    क्यों हमें औरों की तरह, पेश आना चाहिए,
    कभी रूठ जाना चाहिए, कभी मान जाना चाहिए।

    आख़िर क्यों कहें हम सिर्फ़ गज़लें प्रेम, उल्फत पर,
    हमें भी दुःख जताना चाहिए, गम सुनाना चाहिए।

    कोई ना सुनें तो एक रोज़, सिर्फ़ ख़ुद के लिए,
    कभी पढ़ना चाहिए शेर, कभी गीत गाना चाहिए।

    दिल में रख कर बात, ये रात कब बसर होगी,
    सुनना चाहिए उनकी, और कभी बताना चाहिए।

    आजकल की आशिक़ी में, चार दिन की चाँदनी में,
    दिल-ए-नादाँ को ना यूँ सताना चाहिए।

    ये दिखावे का दौर है, दिल की आँखें कमज़ोर हैं,
    इश्क़ हो या इबादत, खुल कर जताना चाहिए।

    ©abhi_mishra_

  • abhi_mishra_ 11w

    तुम्हारे खयालों में रहना तुम्हारे साथ रहने से बेहतर है।

    खयालों में तुम वो सब बोलती हो जो मैं तुमसे सुनने को तरसता हूँ, ख्वाबों में तुम मुझे मनाती हो, और मैं मनाता हूँ तो मान भी जाती हो।

    तुम पास बैठकर सुनती हो जो मैं कहना चाहता हूँ, हर बात पर मुस्कुराकर सर हिला देती हो, तुम चाहती हो कि मैं और कहूँ, वो सब कह दूँ जो आजतक मैं किसी से नहीं कह पाया, वो सब जो तुम्हारे लिए बचा कर रखा था।

    ख़्वाब में तुम्हारा पूरा खाली वक्त मेरा होता है।

    तुम्हारी आवाज़ सुनने को महिनों इंतज़ार करना होता है, खयालों में हर दिन ख़त्म होने पर तुम दिन का हाल सुनाती हो।

    जो सूरत देखने को सालों तरसता हूँ, खयालों में हर रोज़ सामने होती है।
    मैं देखता रहता हूँ, तुम मुस्कुराती रहती हो।

    जाने क्यों लेकिन हर रोज़ बरसात होती है, ख़्वाबों में कोई और मौसम नहीं आता, खयालों में वो बारिश की बूंदें होती हैं और असलियत में शायद आँखों के मोती।

    तुम्हारा हँसना, मुस्कुराना, मनाना, मान जाना, हक़ जताना, बातें बताना शायद ख्वाबों और खयालों में ही मुमकिन है।

    मुझे समझ नहीं आता मुझे तुमसे प्यार है या तुम्हारे ख्वाबों और खयालों से जो मैंने बुने हैं।

    शायद तुम वैसी हो भी नहीं जैसा मैंने तुम्हें खयालों में बना रखा है, शायद मैं दो लोगों से प्यार करता हूँ।

    एक तुम जो असलियत में हो, प्रैक्टिकल और समझदार और एक जो खयालों में है, जिसमें मेरे लिए उतना ही पागलपन है जितना मेरे अंदर।

    शायद इसी वजह से खीझ जाती हो मुझसे, मैं खयालों में खूबसूरत लम्हें सोचकर तुमसे भी वही अपेक्षा करता हूँ।
    तो इस मनमुटाव की जड़ भी मैं ही हूँ।

    यह एक ऐसा प्रेम त्रिकोण है जिसके बारे में जितना सोचता हूँ उतना डूबता हूँ और शायद ही कभी मैं तुम्हें समझा भी पाऊंगा।

    काश मैं तुम्हें समझा पाऊँ वह लम्हें, और हम तीनों मिल पाएं किसी शाम और साथ मुस्कुराएं इन बचकानी बातों पर।

    तुम थोड़ा वक्त बचाकर लाना, मैं ले आऊँगा तुम्हें...



    #hindi #hindiwriters #abhimishra

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    इक शख़्स से दो इश्क़ ऐसे निभा रहा हूँ मैं,
    उससे मिलकर, उस ही से मिलने जा रहा हूँ मैं।

    ©abhi_mishra_

  • abhi_mishra_ 12w

    कुर्बत - closeness

    #hindi #hindiwriters #abhimishra #Fictional

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    ये बात इक बरस की, अब बता रहा हूँ मैं,
    वो गया नहीं ये कहकर, कि जा रहा हूँ मैं।

    बताता गर निगाहों से, निगाहें फेर लेता मैं,
    ये बात कह कह कर ख़ुद को, जता रहा हूँ मैं।

    होते तुम तो शायद ख़ुद से भी मैं प्यार कर लेता,
    तुम्हारे बिन तो बस ख़ुद को जैसे सता रहा हूँ मैं।

    तुम्हारे संग शायद कुर्बतों पर गीत मैं लिखता,
    तुम्हारे बिन उदासी की ही गज़लें गा रहा हूँ मैं।

    जो बादल है, जो पानी है, ये मेरी ही कहानी है,
    कि बहता जा रहा हूँ मैं, बरसता जा रहा हूँ मैं।

    ©abhi_mishra_

  • abhi_mishra_ 14w

    From Draft

    क़हर - संकट, आपत्ति
    बहर - वृत, छंद, शेर का वज़्न
    सहर - Morning
    पहर - Time period

    #hindi #hindiwriters #abhimishra

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    मैं लिखूँ भी तो क्या इस क़हर पर लिखूँ,
    या इस हवा में घुल चुके ज़हर पर लिखूँ।

    लिख दूँ जो भी दिल मेरा, कह रहा है मुझसे,
    या तुम कहो तो तोल कर बहर पर लिखूँ।

    लिखा है मैंने अक्सर काली अँधेरी रातों पर,
    तो क्यों ना फ़िर मैं इस दफ़ा सहर पर लिखूँ।

    इम्तिहानों से गुज़रता है, हर दिन यूँ तो मेरा,
    तुम कहो दिन के कौन से पहर पर लिखूँ।

    इस क़दर दूर आ चुका हूँ कलह, बहस से मैं,
    तुम गाँव को कह दो शहर, तो शहर पर लिखूँ।

    ©abhi_mishra_

  • abhi_mishra_ 16w

    ताउम्र - आजीवन, जीवन के आरम्भ से लेकर अंतिम समय तक

    #Hindi #hindiwriters #abhimishra

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    वो हर मुलाक़ात पर, ताउम्र का वादा कर रही है,
    और ये उम्र है जो सब्र में, इंतज़ार में गुज़र रही है।

    ©abhi_mishra_