_jiya_

random thoughts mixed with some feelings to create a perfect recipe of words.... instagram:@j_khandelwal_

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  • _jiya_ 7w

    To You,
    I always thought that one can never be completely in love with just one person.
    You know those, deeply, madly in love kinds, I could never wrap my head around that.
    But, then I met you.
    You with your heartthrob smile and life in your eyes. You stood right in between the crowd but were still far away from them.
    You read me like a book, a book that I never thought I could be.
    Some chapters are close to your heart, while distant from mine, especially the ones where I feel like tearing the page apart.
    You send me songs that I  only dreamt about as if they were meant for me.
    You reassure me a billion times as if you know I need it.
    You tell me you love me without giving it a second thought, sometimes it catches me off guard, sometimes I see it coming.
    I pick those little 'I love yous' and I fill them up in a jar, just to take each one out when being alone hurts the most.
    That jar is filled upto the brim now.
    You make me believe in myself, in the version of love that I only and only dream about, that I thought was unreal to find.
    YOU, make it real, and with that YOU MAKE ME REAL.
    To You, I belong forever and ever.

    With love:
    The Tahira to Your Ayushmann

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    To You,

    You know those deeply, madly in love kinds,
    I could never wrap my head around those..
    ©_jiya_

  • _jiya_ 37w

    Everybody is broken nowadays,
    It's just about finding someone who wants to fill those gaps, as much as you do.
    ©_jiya_

  • _jiya_ 38w

    मैं लिखूँगी तुम्हे कभी
    अपनी आधी खुली आँखों से उस हल्की स्ट्रीट लाइट की रोशनी में,
    एक अल्साई सी दोपहर में, ना जब तुम साथ होगे ना मेरे होश,
    मैं लिखूँगी तुम्हे कभी
    अपने बालों  की उलझन में, मेरी कंघी को तुम्हारी उंगलियां मानते हुए,
    अपनी कलाई की सिल्वटों में, जब मेरा हाथ तुम्हारे हाथों को थामने की ज़िद करेंगे पर मिलेंगे तोह सिर्फ़ किताब के पन्ने,
    मैं लिखूँगी तुम्हे कभी
    अपनी सूनी आँखों में सुरमा भरते हुए, जब मेरे कदम तैयार होकर सबसे पहले मुझे तुम्हारी तरफ मोड़न्गे, पर मिलेगा तोह सिर्फ़ आइना,
    मैं लिखूँगी तुम्हे कभी
    अपने सपनो में, जब मैं तुम्हारी मर्ज़ी के खिलाफ तुम्हे लेकर एक रोम-कोम बना रही होंगी,
    या फिर सॉल्टेड पोप्कोर्न की उस महक में, जो तुम खास मेरे लिए बनाकर लाया करते थे
    मैं लिखूँगी तुम्हे कभी
    उस खाली राह से गुज़रते हुए, जहाँ पहली दफ़ा तुम्हे देखकर मेरे कदम ठिठके थे
    उस चौराहे पर जहां वोह खूबसुरत हादसा हुआ था
    मैं लिखूँगी तुम्हे कभी
    हम दोनो की उस पसन्दीदा जगह पर, जहाँ शम्मी कपूर के गाने हम साथ गाया करते थे
    उस आधी टूटी फूटी डोली पर जहाँ बैठने से मैं आज भी डरती हूँ
    मैं लिखूँगी तुम्हे कभी
    निदा फ़ाज़ाली साहब की किसी पुरानी पढ़ी गज़ल में जो मैं तुम्हे सुनाया करती थी
    उन पीले पड़ चुके पन्नो में जिन्हे तुम "पतझड़ के पत्ते" कहा करते थे
    मैं लिखूँगी तुम्हे कभी
    क्यूँकी अब हर रोज़ तुम्हे याद करने की शक्ती खो चुकी हूं मैं, अपनी हर छोटी से छोटी बात में
    हर आवाज़ में तुम्हे ढूंढते हुए, थक चुकी हूं मैं
    मैं लिखूँगी तुम्हे कभी
    अपनी भरी डाइरी के आखिरी पन्ने पर और फिर बन्द कर दूंगी उस डाइरी को एक दराज़ में हमेशा के लिए,
    उस आधी लिखी चिट्ठी में जो तुम्हारी दी हुई ऐल्बम में घुल सी गयी है
    मैं लिखूँगी तुम्हे कभी
    तुम्हे फिर कभी ना लिखने के लिए
    मैं; लिखूँगी तुम्हे कभी

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    मैं लिखूँगी तुम्हे कभी

    (CAPTION...)
    ©_jiya_

  • _jiya_ 43w

    वोह पहली दफ़ा दिखा था मुझे एक छोटे से जश्न में,
    खड़ा हुआ था एक दिवार से सट्के इक कोने में,
    एक चुप्पी थी उसके चारों ओर, सहमी सी नहीं, सकूँ भरी,
    उसे देखते ही खो सी गयी थी मैं,
    नहीं उसमें नही उसकी आँखों में, भूरी और इश्क़ से भरी,
    मैं उसके पास जाकर जो खड़ी हुई तो सुना की कुछ गुन-गुना रहा था वो,
    दो पल लगे समझने को पर, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब की कोई नज़्म थी वो,
    शायद 'मुझसे पहली सी मोहब्बत मिरि मेहबूब ना मांग'
    वोह लग रहा था ऐसा, शान्त, थोड़ा मायूस और नज़्मो से भरा,
    उसके लब कम हिलते थे, पर आँखें खूब नाचती थी,
    कभी किसी गज़ल के साथ तो कभी किसी शेर के साथ,
    उसकी आँखों को पढना चाहा था मैने, गहराई में उतरकर,
    लेकिन उनमें मैं कुछ इस कदर डूबी, मानो सागर में एक बूंद पानी,
    उसकी वोह बोलती सी आँखें, बोहोत बातें किया करती थी,
    मेरी और उसकी आँखें ना चाहते हुए भी कई दफ़ा उलझी,
    कभी किसी मय के प्याले की आड़ में, तो कभी किसी क्षय की मात में,
    एक अटपटा सा खेल-खेल रहा था वो मेरे साथ,
    शायद चहता था की मैं बात करूं उससे, पर कम्बख्त मेरे करीब आते ही मुड़कर चला जाता था,
    ना जाने कितनी बार उसकी आँखों ने मेरी नज़र उतारी होगी,
    और नजाने कितनी बार मेरी आँखों ने उसे रोकने की तैयारी की होगी,
    पर हरबार दिल के मन्सूबे दिमाग कहाँ समझता है,
    तो कह आये थे हम अपने दिल-ओ-दिमाग से उसे,
    की आपकी आँखें बहुत खूबसुरत हैं, काफ़ी बातें किया करती हैं,
    काश, मेरी आँखों में भी थोड़ा सुरूर होता,
    बीन बताये बहक जाया करती हैं।

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    उसकी वोह बोलती सी आंखें
    (CAPTION...)
    ©_jiya_

  • _jiya_ 46w

    मैं इंतज़ार करूंगी

    मेरी इस हसीं का जो तुम्हें देखकर मेरे लबों को छुपके से सजाती है

    मैं इंतज़ार करूंगी उन आसुओं का जो तुम्हारे जाने पर मेरी पलकें भिगो जाते हैं

    मैं इंतज़ार करूंगी उन पलों का जो मैने तुम्हारे साथ बिताये और जिनमें मैं खुश हूँ

    मैं इंतज़ार करूंगी मई की उन छुट्टियों का जो मुझे तुम्हारे घर ले जाया करती हैं

    मैं इंतज़ार करूंगी हर उस चीज़ का जो मुझे तुम्हारी याद दिलाया करती हैं

    क्यूँकी फिलहाल मैने तुम्हें दे रखी हैं

    मैं और मेरी चीज़ों में तुम्हारा;
    मैं इंतज़ार करूंगी

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    मैं इंतज़ार करूंगी
    (CAPTION..)
    ©_jiya_

  • _jiya_ 49w

    बैठे हैं इंतज़ार में किसी दीदार-ए-अक्स के,
    अपनी परछाई अब सिर्फ़ परछाई नही लगती
    ©_jiya_

  • _jiya_ 50w

    मुझमें कितनी मैं?
    ये सवाल मैं खुद से कई बार पूछ चुकी हूँ,
    पर जवाब अभी तक नही मिला।
    मुझमें कितनी मैं हूँ ये भी मैं नही जानती,
    उन हज़ारों दुसरे सवालों की तरह जिनके जवाब मुझे रटे रहने चहियें।
    मुझे ये किसी ने नही बताया,
    ठीक उसी तरह जैसे ये नही बताया गया की क्यूँ का कोई जवाब क्यूँ नही होता।
    तीन दिन पहले किसी ने मुझसे एक आसान सवाल पूछा "कुछ बताइये अपने बारे में"
    ये सवाल सुनने में जितना सरल लगता है, मेरे लिए उतना ही कठिन था।
    क्युन्की मैं खुद को तो जानती ही नही।
    मैने हमेशा खुद्को अपनी माँ या अपने पिता की नज़र से देखा है।
    या देखा है तो अपने दोस्तों के नज़रिये से।
    पर मैं हूँ कौन?
    क्या मैं वो लड़की हूँ जो बातें अपनी उम्र से बड़ी और हरकतें अपनी उम्र से छोटी करती हूँ?
    या फिर वो जो एक पल एक हस्ती, खिलखिलाती बच्ची है, और दूसरे पल एक स्नजीदगी से भरी महिला?
    मुझमें आखिर कितनी मैं हूँ?
    और कितनी एक बेटी, एक बहन, एक दोस्त?
    क्या ये सब सवाल सामान्य हैं?
    या मैं कुछ अलग हूँ?
    मैं आखिर हूँ तो हूँ कौन?
    ये सवालों का दलदल मुझे अपने अन्दर खींचता ही जा रहा है, पर शायद मुझे जवाब मिल चुका है।
    "सिर्फ़ आत्मा नश्वर है"
    तो क्या फ़रक पढता है की मुझमें कितनी मैं!
    क्यूँकी असलियत तो सिर्फ़ एक ही है ना,
    की मुझमें कई मैं!

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    मुझमें कितनी मैं?
    (CAPTION...)
    ©_jiya_

  • _jiya_ 50w

    पाकीज़ाह...

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    Basically, I am dreaming a "मुआफ़ कीजियेगा, इत्तेफाकन आपके कम्पार्टमेंट में चला आया था, आपके पाऊँ देखे, बहुत हसीन हैं, इन्हें ज़मीन पर मत उतारियेगा, मैले हो जाएंगे.."
    in this world of "Are you lost babygirl?"
    ©_jiya_

  • _jiya_ 54w

    कभी थोड़ी मायुसी, कभी अत्यंत प्यार,
    कभी पूरी रात बातें, और कभी एक लफ्ज़ भी नहीं,
    कभी वोह मैगी वाला मूड, तो कभी सेक्सी वाला,
    वोह रात के 1:30 बजे वाली फीलिंग भी ना, आजीब है।
    कभी 3 किताबें एक बार में पढ़ जाना, तो कभी एक पन्ने पर ही सो जाना,
    कभी कभी तारों को निहारना, तो कभी चल रहे पंखे को घूरना,
    कभी घर में किसी भूत की तरह टहलना, तो कभी कुम्भकरण की तरह सोना,
    वोह रात के 1:30 बजे वाली फीलिंग भी ना, अजीब है।
    कभी गानों में खो जाना, तो कभी खुद गुलज़ार बन जाना,
    कभी अरिजित को गले लगाना, तो कभी लता दीदी की गोद में सो जाना,
    कभी पुराने किस्से उधेड़ना, तो कभी नई यादों को समेटना,
    वोह रात के 1:30 बजे वाली फीलिंग भी ना, अजीब है।
    कभी इर्र्फान की आंखें, तो कभी शम्मी कपूर का डांस,
    कभी पारो की चिट्ठियों को उलट-पुलट लेना तो कभी फैज़ल का बदला लेना,
    कभी रात भर सुबह का इंतज़ार, तो कभी उसी रात में घुम हो जाने का खयाल,
    वोह रात के 1:30 बजे वाली फीलिंग भी ना, अजीब है।

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    वोह रात के 1:30 बजे वाली फीलिंग

    (CAPTION...)
    ©_jiya_

  • _jiya_ 54w

    मैं कोशिश कर रही हूँ तुम्हें भुलाने की,
    पर इतना आसान नहीं हैं ना।

    मैं कोशिश कर रही हूँ उन लम्हों को मिटाने की,
    पर अब वो आस्माँ नहीं हैं ना।

    मैं कोशिश कर रही हूँ हर रात, हर दिन,
    पर तुम भूल जाने वाले शक़्स नहीं हो ना।

    जब तुम थे तब मैं तुम्हें 'आप' बुलाया करती थी,
    पर; अब तुम नहीं हो ना।

    मैं कोशिश कर रही हूँ, अपनी चाय की आदत छुढ़ाने की,
    पर अब वो बस आदत नहीं है ना।

    मैं जानती हूँ कुछ ज़्यादा ही समय लग रहा है मुझे,
    पर मैं कोशिश कर रही हूँ।

    आज नही तो कल, तुम होगे एक पुराना चैप्टर मेरी कहानी में,
    पर ये कहानी अभी पूरी नही है ना।

    मैं कोशिश कर रही हूँ रात में जल्दी सोने की,
    क्यूँकी अब जागे रहने की कोई वजह नही है ना।

    मैं कोशिश कर रही हूँ उन गानों को अनसुना करने की,
    पर वो गाने अब सिर्फ़ 'गाने' नहीं हैं ना।

    मैं वादा करती हूँ मैं तुम्हें भूल जाऊंगी,
    क्यूँकी अब याद रखने का हक़ मुझे नहीं है ना।

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    मैं कोशिश कर रही हूँ
    (CAPTION...)
    ©_jiya_