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  • _himanshi__ 4w

    जिंदगी में आराम , ख्यालों पर विराम , होठों पर मुस्कान ढूंढ रहा हूं ।
    देखो ना कितना पागल हूं , दौड़ती भागती दुनिया में सुकून ढूंढ रहा हूं ।

    कभी खुदसे , कभी तुमसे , तो कभी इस दुनिया से जुदा हो रहा हूं ।
    खो कर दूसरों से अपना अस्तित्व , मैं खुद में अब बेफिक्री ढूंढ रहा हूं।

    बेचैन सी रातों में , सुनसान सी राहों पर धुंधली सी मंजिल देख रहा हूं ।
    कहानियां लिखने की कश्मकश में अपने ही किरदार से लड़ रहा हूं ।

    तराशनी है जब कमियां खुद में , दुनिया को गलत साबित कर रहा हूं ।
    क्यूं मैं खुद को सही समझ कर , सभी से जबरदस्ती बैर कर रहा हूं ?

    गलत है मेरी नज़रे या मैं ही गलत हूं , ना जाने क्यों गलतियों से प्रेम कर रहा हूं ।
    खुद से करीब आने की लालसा में , क्यों मैं सबसे दूर हो रहा हूं ?

    खुद को दुनिया से संभाल रहा हूं , या खुल कर जीने से कतरा रहा हूं ।
    मैं जिंदगी को संवारने की उम्र में , जीने से बचने के रास्ते ढूंढ रहा हूं ।

    तुम हो तो मैं प्रेम हूं , तुम नही तो यहाँ सभी से नफरत कर रहा हूं ।
    घर से दूर इस नए शहर में , हर रोज मां मैं तुमको ही ढूंढ रहा हूं ।


    At a totally new place , I am a small town girl struggling hard to settle and cope up with the pace of this big city .
    The biggest problem is we cannot share what we feel to anyone here . Not even with ourselves .
    Home makes us feel raw . Home accepts all our emotions .
    Missing Home
    Missing Maa

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    तुम हो तो मैं प्रेम हूं , तुम नही तो यहाँ सभी से नफरत कर रहा हूं ।
    घर से दूर इस शहर में , हर रोज मां मैं तुमको ही ढूंढ रहा हूं ।

  • _himanshi__ 10w

    मैंने सुना था अक्सर ,
    ईश्वर सब जगह है ।
    मैंने देखा था कल
    मेरी उम्मीदों को, मेरे लिए दुआओं को,
    मेरे सपनों को, मेरे दर्दों को,
    मां की साड़ी के पल्लू की गांठ में ।
    अब मैं मानती हूं
    मां ही ईश्वर है ।

    bye.

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    मां ही ईश्वर है !

  • _himanshi__ 14w

    मुझे ज्यादा कुछ नही चाहिए ,
    सिर्फ एक छोटा सा घर
    जिसमे हजारों खिड़कियां दरवाज़े हों ।
    किसी भी खिड़की पर पर्दा ना हो ,
    हर सुबह सूरज की पहली किरण
    मेरी सोई हुई उम्मीदों को
    प्यार से सहलाकर जगाए ।
    हर शाम हवा के झोंके
    मेरे ख्वाबों के पंखों को
    खुलकर उड़ना सिखाएं ।
    इस घर में कोई छत ना हो,
    हर सावन बारिश की पहली बूंद
    मेरी ख्वाहिशों की मिट्टी को
    आज़ादी की खुशबू से महकाए ।
    किसी भी दरवाज़े पर कुंडी ना हो ,
    हर समय रास्ता खुला मिले
    मेरे खयालों को सफर के लिए ।
    मुझे ज्यादा कुछ नही चाहिए ,
    सिर्फ ऐसा छोटा सा घर
    जो मेरे दिल की खाली ज़मीन पर हो।

    bye.

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    घर

  • _himanshi__ 15w

    लेखक होना भी कहां आसान है ?
    अपने दर्दों को भी इस कदर लिखना पड़ता है की दर्द कम प्रेम ज्यादा महसूस हो ।
    मैंने हर बार जब ना लिखने की कोशिश की है , हर बार तुमने मुझे लिखते रहने की वजह दी है । दर्द लिखने की , तुम्हारी खुदगर्ज़ी लिखने की , मेरी अनकही बातें लिखने की और इन सभी के बीच मुश्किल से सांस लेता हमारा प्रेम लिखने की ।

    दूरियों से खौफ खाते तुम ,
    नजदीकियों से कतराती मैं ,
    बेखुदी से दोस्ती करती मैं ,
    खुदगर्ज़ी में गुम होते तुम ,
    आखिर कैसे जीयेगा यह प्रेम ?

    हर दफा आज भी जब तुम हौले से मेरी गोद में सोकर कसकर मेरा हाथ पकड़ कर खो जाते हो कहीं , मैं ढूंढ लेती हूं वो गुम हुआ प्रेम और छिपा देती हूं उसे तुम्हारी थोड़ी सी खुली आंखों और पलकों के बीच ताकि जब तुम आँखें खोलो और देखो मुझे , हमारे बीच जी उठे वह प्रेम ।

    हर बार प्रेम लिखने के बहाने से मैने लिख दिया तुम्हे थोड़ा ठीक ठाक सा , यह लेखनी अच्छी भी हो जाएगी जिस दिन मेरे ना होने पर तुम इसे पढ़ोगे और फिर से जीवित कर दोगे उस मरते हुए प्रेम को ।
    मेरी लेखनी के लिए सबसे सुखद अंत होगा वह ।
    अंत जो इस लेखनी को एक नई शुरुआत देगा ।
    बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम "वो लड़की बहुत याद आती है" के बाद चला देते हो "मेरा दिल भी कितना पागल है"। इन दोनों गानों के बीच कहीं ना कहीं सांस लेता ही होगा वह मरता हुआ प्रेम और फिर एक नया जन्म मिल जाता है अपने प्रेम को ।

    एक तैराक कभी नही मरता डूब जाने से , वह मरता है तैरने की कोशिश न करने पर , ठीक वैसे ही हमारा प्रेम कभी नही मरेगा इंतज़ार में , यह मर रहा है इंतज़ार ना करने से । एक दिन जब तुम संभल जाओगे और आओगे मुझे ढूंढने मैं डूब जाऊंगी तब तक लेकिन तुम बस एक बार गा देना " ओ घर आजा परदेसी कि तेरी-मेरी एक जिंदड़ी " और मैं गाऊंगी "मैं दौड़ी आऊंगी बस तुम एक आवाज़ लगाना" ।

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    एक लेखक ने अपना सर्वस्व प्रेम अपने प्रेमी से ज्यादा अपनी कलम को दिया है , शायद इसी वजह से हर लेखक की कहानी अधूरी ही रही है , कहीं सांस ले रहा है उसका प्रेम उसकी कलम की स्याही की आखरी बूंदों में जो उसकी लेखनी में खर्च होने ही वाली हैं ।
    शायद इसीलिए कभी कभी अपने प्रेम की मौत को बचाने के लिए लेखक रोक देता है लिखना ।
    अजीब विडंबना है , अपने प्रेम को प्रकट करने का एकमात्र तरीका ही उस प्रेम की मौत का कारण बन जाता है ।
    शायद एक लेखक का सबसे बड़ा डर यही है , अगर मैंने लिखा तो प्रेम मर जाएगा अगर नही लिखा तो मेरी कलम मर जाएगी । अंत में एक लेखक चुनता है अपनी कलम और श्रद्धांजलि देता है अपने प्रेम को जीवन भर अपनी कलम से ।

    bye.

  • _himanshi__ 16w

    मुझे हिंदी भाषा से उतना ही प्रेम है जितना हर फौजी को अपने देश से होता है । हर फौजी अपने देश की हिफ़ाज़त करता है एक बंदूक और मुट्ठी भर जज़्बे से ठीक वैसे ही हर लेखक अपनी भाषा की हिफ़ाज़त करता है अपनी कलम और मुट्ठी भर प्रेम से । हर फौजी थोड़ा सनकी होता है क्योंकि उसका मुठ्ठी भर जज़्बा उसके मन की भावनाओं से जीत जाता है और बना देता है उसे थोड़ा सा कठोर । हर लेखक थोड़ा समाजसेवी होता है क्योंकि उसका मुठ्ठी भर प्रेम दुनिया भर की नफरत से जीत जाता है । जैसे हर एक फौजी जानता है अपने देश की कमियों के बारे में लेकिन निस्वार्थ प्रेम करता है ठीक वैसे ही हर लेखक जानता है अपनी भाषा की कमियां लेकिन निस्वार्थ प्रेम करता है और उन्ही कमियों से अलंकृत करता है अपने लेखनी को ।

    मुझे हिंदी भाषा की सबसे बड़ी कमी लगती है एक शब्द "काश" । इस शब्द की शुरुआत हमारी सोई हुई उम्मीदों को जगा देती है लेकिन इस शब्द का अंत हमें कड़वी सच्चाई से मिलवा देती है ।

    काश

    काश ये आंखें खुली ना होती ,
    अंधेरे में छिपी रो रही होती
    काश तुम रोशनी बन आते नही
    काश तुम रोशनी बन जाते नही ।

    काश ये लब खुले ना होते ,
    अकेलेपन में सिले ही होते
    काश तुम आवाज बन आते नही
    काश तुम चीख बन जाते नही ।

    काश ये दिल बिखरा न होता
    टूटा ही रहता बस उलझा न होता
    काश तुम मरहम बन आते नही
    काश तुम ज़ख्म बन जाते नही ।

    काश ये पैर डगमगाते नही
    तुम्हारे साथ संभलते नही
    काश तुम सहारा बन आते नही
    काश तुम सहारा बन जाते नही ।

    काश मैं एक सवाल ही रहती
    पहेली बन उलझी हुई रहती
    काश तुम सुलझन बन आते नही
    काश तुम उलझन बन जाते नही ।

    काश मैं लापरवाह सी रहती
    बेफिक्र बेपरवाह ही होती
    काश तुम जिंदगी बन आते नही
    काश तुम जिंदगी बन जाते नही ।

    bye .

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    काश !

  • _himanshi__ 17w

    bye.
    I don't want to write but I don't know how to stop myself .

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    मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा साथ अंतिम छोर तक
    बस एक बार अंतिम छोर पर मिल लेना मुझसे ।
    बस ख्वाइश है एक कि तुम रहो मेरे पास जब मैं हार जाऊं इन सांसों के आगे और अधूरी छोड़ दूं यह कविताएं । जानती हूं तुम नही आओगे ।
    विरह की वह घड़ी तुम बिन गुजरी तो मोक्ष नहीं मिलेगा मेरी इन अधूरी कविताओं को ।
    मोक्ष ना मिलने पर यह सभी कविताएं भटकती रहेंगी इस ब्रह्मांड में तुम्हें खोजती हुई ।
    तुम सामने खड़े रहोगे लेकिन यह नहीं आएंगी तुम्हारे नज़दीक क्योंकि एक बार फिर से यह नहीं भटक पाएंगी अगर तुमने इन्हें विरह के बदले प्रेम दे दिया ।
    भटकते हुए एक दिन इन सभी कविताओं के शब्दों का वर्ण विच्छेद हो जाएगा और फिर यह सभी वर्ण घूमते रहेंगे अपनी अक्ष रेखा पर उस पेड़ के इर्द गिर्द जिसके नीचे तुम मुझसे मिलने आया करते थे ।
    फिर एक दिन यह सभी अक्ष रेखाएं प्रकृति के नियमों से विपरित मिल जाएंगी एक दूसरे से और यह सभी वर्ण एक दूसरे से जुड़ जाएंगे फिर से एक बार ।
    जैसे ही तुम जाओगे उस पेड़ के करीब इन कविताओं को पढ़ने के लिए , तभी मैं आ जाऊंगी एक आंधी बन कर गिरा दूंगी उस पेड़ को और लुप्त हो जाएंगी वह कविताएं ।
    तुम उठा लेना उस पेड़ के कुछ टूटे हुए पत्ते , एक आम और थोड़ी सी मिट्टी उस पेड़ के नीचे से ।
    तुम दे देना वाह आम अपनी बेटी को , रख देना यह पत्ते अपने बेटे की किताबों के बीच और उस मिट्टी में लगा देना एक तुलसी का पौधा अपने घर के आंगन में और फिर मिल जाएगा मेरी कविताओं को मोक्ष ।
    ©_himanshi__

  • _himanshi__ 18w

    #rant

    तुम ही से खफा , तुम ही से मुकम्मल हर दुआ
    खुशी भी तुमसे , दर्द भी तुम ही से
    ना जाने कैसी उलझन में फंस गया ये रिश्ता
    ख्वाहिशें भी तुमसे , नाराज़गी भी तुम ही से ।

    याद है आपको बचपन में हर रोज़ ठीक 6 बजे आप घर आते थे और मैं ठीक 5 बजे ही तैयार हो कर बैठ जाती थी आपके इंतज़ार में । एक ग्लास नींबू पानी पीकर बिना आराम किए आप ले चलते मुझे पहले कंधे पर बैठा कर फिर जब बड़ी हुई तब उंगली पकड़ कर ।
    " आज कहां चलेंगे हम ?"
    " हर रोज़ पूछती है तू , पता है ना मैं नही बताऊंगा ।"

    आज भी हजारों सवाल है मेरे मन में और मैं जानती हूं आप अब भी जवाब नही दोगे । नही बताओगे इसलिए मैं पूछती भी नही , लेकिन ये ख़ामोशी तोड़ रही है मुझे । डरने लगी है आपकी बेटी अब हर मर्द से । अगर आप बदल सकते हो तो कोई भी बदल सकता है । आप को लगता है मैं आपसे नफरत करती हूं , नही कर पाती हूं । हर रोज़ कोशिश करती हूं लेकिन हार जाती हूं खुद को आपसे दूर करने में । हर रात जब कोई नही होता मेरे आंसू पोंछने के लिए और मेरी बातें सुनने के लिए बस यही सोचती हूं काश सब कुछ पहले जैसा हो जाए । एक बार आप खुद के लिए बदल गए थे , काश एक बार मेरे लिए बदल जाओ । काश मुझे वो पापा वापस मिल जाएं जो कुछ सालों पहले मुझसे दूर हो गए ।

    यह जो अनदेखा कर देते हो आप मुझे , बिना बात चिल्ला देते हो मुझ पर , हर बात का गुस्सा मुझ पर निकाल देते हो , हर रोज मुझसे नफरत करने की कोशिश करते हो , क्यों करते हो ऐसा ? मैं तो वही हूं ना जिसके लिए कभी आपने रातें बिना सोए काटी थी , जिसके लिए आप भूखे पेट रह लेते थे , जिसके मामूली सी बुखार होने पर आप का बीपी हाई हो जाता था , पापा आप इतनी आसानी से कैसी बदल गए ? इतना आसान कैसे हो सकता है अपने परिवार से प्रेम ना करना सिर्फ अपनी दो पल की खुशी के लिए ?

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    पापा

    आप जानते हो मैं रो देती थी अगर आप मुझसे बात नही करते थे तो , आज सालों बीत गए हमारी बातें नही हुई , क्या आपको मालूम है मैं रात को सोती नही हूं । हां अब रोती नही , क्या है ना की आँखें बहुत मतलबी होती हैं सिर्फ तब तक रोती हैं जब तक रो पाती हैं लेकिन यह दिल बहुत वफादार है यह हर रोज रोता है । कभी तो आओ और इस दिल को संभालों , इसके आंसू पोंछ दो । उस दिन यह आंखें भी रोने लगेंगी फिर से ।

    आप जानते हो मैंने अपनी ऑलमोस्ट हर खुशी का कुर्बान कर दिया था सिर्फ आपकी वजह से । अब सिर्फ दो वजह हैं मेरे पास खुश होने की , सबसे पहली मां और दूसरा वो लड़का जो आपकी बेटी को बिल्कुल वैसे प्यार करता है जैसे आप करते थे कुछ सालों पहले । आप वापिस नही बदलोगे , आप वापिस अच्छे नहीं बनोगे यह कड़वा सच मैंने अपना लिया है लेकिन प्लीज मुझसे मेरी खुशी की यह दो वजह मत छीनो ।

    मैं जिंदगी भर के लिए आपकी नफ़रत में थोड़ा थोड़ा प्यार ढूंढ लूंगी लेकिन इन दो लोगों से सिर्फ प्यार चाहती हूं मैं । प्लीज इन्हे मुझसे प्यार करने दो ।

    और हां , आपकी खुशी के खिलाफ़ कभी कुछ नही किया मैंने और ना ही कभी करूंगी ।
    सभी कहते हैं मैं बिल्कुल आप जैसी हूं , शक्ल सूरत से भी और आदतों से भी पर मैं आप जैसी नही हूं पापा और इसी बात का गर्व है मुझे और विश्वास है खुद पर मैं कभी आप जैसी नही बनूंगी ।

    आपकी बेटी हर रोज़ आपका इंतजार करती है , कभी तो आप ऑफिस से लौटते हुए इस बैग के साथ खुद को भी वापस लाओगे । आओगे ना आप खुद को फिर से बदल कर ? मेरे लिए फिर से अच्छे बनोगे ना ?
    ©_himanshi__

  • _himanshi__ 18w

    I don't know what's happening .
    Shayad main bhaag rahi hu likhne se. Kyuki jitna main likhti hu utna mai isi me uljhi rahti hu
    Jo pata nahi sahi hai ya galat
    Par likhne se khud ko rok bhi nhi sakti .
    mai likhne se bhaag rahi hu ya khud se ?

    Maybe I will return or maybe not .
    Idk
    Par firse BYE��

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    बातें

    "Suno ?"
    "Haa"
    "Bolo na ?"
    "Kya ?"
    "Anything ?"
    "Anything ?"
    "Umm .. Everything !!"
    "Aap nahi samjhogi"
    "Fir bhi bolo"
    "Thak gaya hun mai ab"
    "Mujhse ?"
    "Nahi , ham dono se "
    "To kya karna hai ?"
    "Mujhe nahi pata"
    "Khatam karna hai ?"
    "Esa na kabhi mehsus kiya hai na kabhi kar paunga . Bas thora thak gaya hun sab sahi karte karte "
    "To kya kare ?"
    "Jesa chal rha hai chalne dete hain"
    "Suno ?"
    "Haa"
    "Tumhe travelling pasand hai na ?"
    "Haa"
    "To tum ek kaam kar sakte ho , lifetime travel krte raho bas , bina thake bina ruke har roj har din har ghante har second "
    "Ese kese kar sakta hu ? Kabhi to rukna pdega na araam karne ke liye"
    "Haa , thak gaye ho na aaraam karlo fir sochege kya krenge wapas chalenge ya rasta badal lenge"
    "Suno ?"
    "Haa"
    "Aaram karte hue nahi chal sakte kya ?"
    "Matlab ?"
    "Main thak gaya hun , haara nahi hun . Aap jaante ho mai kitna complicated insan hu . Selfish hu yaar mai . Mujhe jarurat hai aapki khud ke liye . Is safar ke liye . Mere araam ke liye . Aap hi safar , aap hi manjil aur aap hi aaram . Aur main musafir ."
    "Suno ?"
    "Haa"
    "Bolte hue nahi thakte ?"
    "Hahaha.. Saath rehte hai to ye aadat to aapke mujhe lag hi gayi ."
    "Rehne do . Main kahan bolti hu ?"
    "Hmmmmmm "
    ©_himanshi__

  • _himanshi__ 20w

    कभी कभी कुछ फैसलों को समय और भगवान पर छोड़ देना चाहिए
    शायद हम कोशिश कर के नियति के साथ खिलवाड़ करने लग जाते हैं
    जिसका बदला किस्मत हम से जरूर लेती है
    और फिर अंत बहुत दुखदाई होता है ।

  • _himanshi__ 20w

    सुनो ,
    हां तुमसे ही कह रही हूं , सुनो ना । मुझमें रहते हो और मेरी ही नही सुन रहे । सुनना पड़ेगा , मैं तुम्हारे अच्छे के लिए ही तो कह रही हूं ।
    हां तो सुनो दिल ,
    क्यों तुम इतने निस्वार्थ हो ? दर्द नही होता क्या तुम्हे इस अकेलेपन से ? जब भी किसी को तुम्हारी जरूरत थी , तुम तैयार थे अपने टूटे हुए टुकड़ों को संभाल कर समेट कर अपने दुख को भुलाकर किसी और को गले लगाने के लिए । क्या तुम्हे दूसरों के टूटे दिल के टुकड़े चुभते नही ? क्या उन तीखे टुकड़ों से तुम्हारी दीवारों पर खरोंच नही पड़ी थी ? इन सभी सवालों का जवाब हां ही है लेकिन तुम तो छुपा कर बैठे रहोगे।
    हां जानती हूं तुम्हे बचपन से आदत है यह सब करने की लेकिन एक बात बताओ । क्या अब इतने सालों बाद तुम थके नही , कमज़ोर नही पड़े , इन घावों से तुम छलनी नही हुए ? और आखिर कब तक यह सब झेलते रहोगे ? कभी तो खुद को भी प्रेम करो । हां भई जानती हूं , तुमने दूसरों को प्रेम कर के ही खुद को प्रेम किया है , लेकिन कभी तो इन आंखों पर भी तरस खाया करो । आखिर कब तक यह तुम्हारी गलतियों की सज़ा भुगतती रहेंगी ? और अगर तुम्हे दर्द होता ही नही है , तो फिर क्या ये आंसू झूठे हैं ? दिन भर सभी के आगे मुस्कुरा कर जब रात में रो कर इन आंखों को सूजा लेते हो फिर कैसे खुद से नज़रे मिला पाते हो ? छोड़ गए ना वह सभी जिन पर तुम्हें अटूट विश्वास था ? जो कुछ लोग अभी भी हैं , वह अब सुनना नही चाहते तुम्हारा दर्द । मिल गया सुकून खुद की हंसी उड़वा कर ? तुम्हारी अच्छाई को जब तुम्हारी कमज़ोरी समझ कर खिल्ली उड़ाई गई , तब लगा था ना बुरा ? टूट गया था ना वह "अटूट विश्वास " जब खुद को अहमियत दे कर सभी तुम्हे नकार कर चले गए ?

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    पता है तब तुम्हे सबसे ज्यादा जरुरत तुम्हारी थी , लेकिन तुमने कभी सीखा ही नही खुद का साथ देना । तुमने कभी अपनी अहमियत , आत्मसम्मान और स्वावलंबन का साथ नही दिया । बस इंतज़ार करते रहे कोई तो होगा जो तुम्हारी तरह तुम्हे संभालेगा । लेकिन जिंदगी की यही रीत है , जब तक तुम खुद को नही संभालोगे , और कोई तुम्हारी तरफ नही देखेगा । हर गिरती हुई चींटी को खुद ही उठना पड़ता है , दुनिया सिर्फ गिराती ही है । हां कभी कभी एक हाथ आता है उठाने के लिए , लेकिन वह भी दूर खड़ा हो जाता है जब तुम्हारी अच्छाई उसे खलने लगती है । छोड़ता नही है वह तुम्हे , लेकिन परेशान हो जाता है तुम्हारी अच्छाई से , लेकिन तुम तो कभी उससे परेशान नहीं हुए थे । उसकी गलती नही है यह , तुम्ही ने हद से ज्यादा उम्मीदें रख ली थी । वह अब भी साथ है , हमेशा रहेगा , लेकिन नही सुनना चाहता अब वह तुम्हारा दर्द जो तुम्हारी अच्छाई ने तुम्हे पहुंचाया है ।


    चलो देखो अब मैं जानती हूं , तुम खुद को नही बदलोगे । तुम्हे गर्व है अपनी इस अच्छाई पर और होना भी चाहिए आखिर मिलते कहां है आजकल ऐसे दिल ? लेकिन अब तुम्हे एक आदत बदलनी होगी , सिर्फ एक ही आदत । किसी और का इंतज़ार करना बंद कर दो । तुम्हे सिर्फ तुम ही समझ सकते हो। कोशिश कर ली ना सभी को समझाने की , कोई भी नही समझ पाया । किसी ने साथ दिया भी तो तुम्हारे अकेलेपन को नही दूर कर पाया । अपना लो अब तुम खुद को । साथ दो सभी का लेकिन किसी के साथ की उम्मीद मत रखो । अकेलेपन में खुशी ढूंढ लो । एक दिन तुम खुद का सुकून खुद में ढूंढो । साथ सभी को रखो , प्यार सभी को करो , समेट लो सभी का दर्द खुद में लेकिन अपना दर्द भी खुद ही समेटों , लोग आएंगे और चुपचाप देखते रहेंगे , समझने की कोशिश भी करेंगे तो नही समझ पाएंगे क्योंकि तुम उन सब के जैसे नही हो । बंद कर दो आत्मसम्मान की धज्जियां उड़वानी । और हां वैसे भी तुम्हारा काम सिर्फ धड़कना है ना , तो वही करो , इन सभी में क्यों उलझते हो ?