_bahetiankita

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  • _bahetiankita 3d

    मेरे ख्वाबों का संसार

    कुछ ख्वाब मेरे पूरे हुए कुछ टूट गए,
    कुछ ख्वाब अधपके से जल्दबाजी में छूट गए,
    कुछ को चढ़ाया मैंने मंदी आंच पर पकने,
    पर जिम्मेदारियों के बीच उलझी, उन्हें रख कर भूल गई,
    होश तब आया जब जलने की गंध उठी,
    कुछ रखे थे कहीं सहेज कर छुपाकर,
    यह सोच कर कि,
    आराम से बड़े मन से एक-एक कर उन्हें पूरा करूंगी,
    पर कामकाज की व्यस्तता के बीच
    कर्तव्य निर्वहन के साथ
    वह कहीं अंदर ही अंदर रह गए,
    जब फुर्सत में उनकी याद आई,
    सोचा अब पूरा कर लिया जाए,
    तो देखा वे तो सड़ चुके थे,
    उनसे तो बू आने लगी थी,
    उठा कर फेंक दिया उन्हें कूड़ेदानी में,
    देखा मैंने अपने ख्वाबों को जलते हुए,
    सड़ते हुए, जल्दबाजी में अधपके से छूटते हुए,
    बहुत दर्द मिला, चीखी चिल्लाई और रोई भी,
    फिर भी ख्वाबों को देखा नहीं छोड़ा,
    क्योंकि ये ख्वाब ही तो हैं,
    जो जीवन में नवीनता लाए हुए हैं,
    उमंग को जगाए हुए हैं,
    हर बार एक उम्मीद दिखाते हैं,
    पर अब की बार यह ध्यान दूंगी कि,
    कोई जल ना जाए, सड़ ना जाए,
    जल्दबाजी में अधपका सा छूट न जाए।
    ©_bahetiankita

  • _bahetiankita 1w

    If you want your child's dream to touch the sky,
    You must gift him wings to fly high,
    Teach him faith and self-confidence to aspire,
    For they will give him the strength he requires,
    But not you forget to give him roots,
    So no matter how far he goes, he will always be connected to origins without dispute,
    These two attributes are essential for the child,
    So that none of his dreams remains uncompiled!
    ©_bahetiankita

  • _bahetiankita 1w

    पहल

    सच मुश्किल है वो
    पहली शुरूआत
    बड़ा कठिन होता है
    वो पहला कदम बढ़ना
    फिर सम्भलकर आगे
    बढ़ते जाना
    दुनिया तो सदैव ही
    नई पहल की आस
    में रहती है
    पर पहल करने
    से डरती है
    जो भी शुरूआत
    करे उसपर ताने
    कसती है, हंसती है
    पर बदलाव तो नियम है
    अच्छा लगे, बुरा लगे
    समय उद्यम है
    इतिहास गवाह है
    हर पहल को पहले
    दुत्कार, फटकार ही मिली
    पर संग आई खुशियां
    तो फिर सबने अपना ही ली
    तो क्यों ना कुछ अलग करें?
    इस बार नई पहल का साथ दें
    पछताने से अच्छा
    उसका हिस्सा बनें
    और बेपरवाह हो
    दिल की सुने;
    किसी के लिए
    पहल करना आसान करें।
    ©_bahetiankita

  • _bahetiankita 2w

    राधा तू क्यों ना बनी श्यामा?

    राधे! अनजाने ही तू ने,
    रंगभेद का बुना ताना बाना,
    राधा तू क्यों ना बनी श्यामा?

    श्याम रंग लिए कान्हा धरा पर आए,
    तेरे अलौकिक प्रेम में,
    तुझसे पृथक रहकर भी तेरी कहलाए,
    तेरे अप्रतिम सौंदर्य का सृष्टि ने गाया गाना,
    अनजाने ही तू ने रंगभेद का बुना ताना बाना,
    राधा तू क्यों ना बनी श्यामा?

    श्वेत वर्ण, तीखे नैन नक्ष,
    तेरे रूप रंग का है सर्वत्र वर्णन,
    आज भी स्त्री की सुंदरता श्वेत रंग से नापी जाए,
    हर कोई चाहे गोरी पत्नी पाना,
    अनजाने ही तू ने रंगभेद का बुना ताना बाना,
    राधा तू क्यों ना बनी श्यामा?

    काश! कृष्ण होते श्वेत और राधे तू श्याम रंग,
    तब प्रेम की परिभाषा का अलग ही होता ढंग,
    किसी लड़की को फिर ना सुनना पड़ता,
    काली, कलूती, कलिया, जैसे श्याम वर्ण पर ताना,
    राधा तू अब बन आना श्यामा!
    राधा तू अब बन आना श्यामा!
    ©_bahetiankita

  • _bahetiankita 2w

    Forgiveness

    I agree to you, its easy to say, hard to do,
    But try dear, try to forgive what happened with you,
    Not for the sake of saying just forgive,
    Forgive when you are ready to forgive,
    Forgiveness is a blessing in disguise,
    Trust me it makes you feel light and nice,
    If you hold grudge you are the one who is in pain,
    You punish yourself harshly and to you only, joy is detained,
    Because holding something for so long creates only negativity,
    Forgiving will give you best feel and you can live life with full zeal,
    So forgive my friend, give yourself this gift!!
    ©_bahetiankita

  • _bahetiankita 2w

    मां

    क्या कहूं? क्या लिखूं?
    कहां तू शब्दों में समाएगी?
    कहां किसी पोथी या ग्रंथ में बंध पाएंगी?
    तू ही मुझे इस दुनिया में लाने का स्त्रोत
    तू ममत्व, निश्छल प्रेम, वात्सल्य से ओत प्रोत
    तू चंचला सम सदैव हर लेती हर दुःख को
    पद पड़ते जहां तेरे खुशियां आ जाती उस ओर
    जब भी संशय में घिरे, तू आशा की लौ बनी
    गिरना नहीं बुरा, उठ आगे बढ़ने की तू ने सदैव समझ दी
    स्वाभिमानी तू ने सदैव देना ही जाना
    प्रत्युपकार में कुछ ना मांगा ना चाहा
    कभी शिथिल हो, जब पथभ्रष्ट हो जाते
    तब आज भी तेरे अविरल संघर्ष को देख प्रेरणा पाते
    जीवनदायिनी, तुझे शत शत नमन
    तेरे ऋण को मैं मां कैसे चुकाऊं?
    बस यही मांगू हर जन्म में तुझे ही मातृरूप में पाऊं।
    ©_bahetiankita

  • _bahetiankita 2w

    पथिक

    हे पथिक, तू रह अडिग,
    अपने ध्येय की ओर चल,
    चल अविरल,

    आए चाहे तूफान,
    या चले आंधियां,
    या कौंधे डराती बिजलियां,
    हे पथिक, तू रह अडिग

    मार्ग सजा हो कंटकों से,
    या भरा हो पत्थर, कंकरों से,
    या सटा हो खप्पर कंकालों से,
    हे पथिक, तू रह अडिग

    हो जाए स्याह अंधकार,
    या दिखे ना कोई दूर तक,
    या छूटने लगे आशा का हाथ,
    हे पथिक, तू रह अडिग

    याद रख, तूफानों को थमना होगा,
    कठिन मार्ग पर आगे बढ़ना होगा,
    रात के बाद दिन में रोशनी को आना होगा,
    तो रख आत्मबल, विश्वास, संबल,
    डगर कितनी भी बड़ी हो ध्येय तक जाएगी ही,
    तेरे जीवन बगिया को महकाएगी ही,

    तो हे पथिक, तू रह अडिग
    अपने ध्येय की ओर चल,
    चल अविरल, चल अविरल।
    ©_bahetiankita

  • _bahetiankita 3w

    महादेवी वर्मा जी की जयंती पर कुछ लिखने की कोशिश।

    "क्यों इन तारों को उलझाते?
    अनजाने ही प्राणों में क्यों,
    आ आ कर फिर जाते?"

    व्योम में विचरते मेघ,
    गर्जन कर वर्षा को बिखराते,
    बुझ जाती धरा की प्यास,
    मेरा अंतर क्यों तृषित छोड़ जाते?

    रोशनी से प्रतिबिम्बित हो,
    जब सजल नयन हैं मुस्कुराते,
    तब होता सुख आलौकित,
    दुःख वहां ना स्थान पाते।

    देव, तेरा स्वर्ग प्रलोभन,
    औ' अमरत्व भी नहीं लुभा पाते,
    श्वास की अनमोल निधियां,
    कहां धन से मृत्यु को तोल पाते?
    ©️ अंकिता बाहेती

    #byank

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    क्यों इन तारों को उलझाते?

    क्यों इन तारों को उलझाते?
    अनजाने ही प्राणों में क्यों
    आ आ कर फिर जाते?

    पल में रागों को झंकृत कर,
    फिर विराग का अस्फुट स्वर भर,
    मेरी लघु जीवन वीणा पर
    क्या यह अस्फुट गाते?

    लय में मेरा चिर करुणा-धन
    कम्पन में सपनों का स्पन्दन
    गीतों में भर चिर सुख चिर दुख
    कण कण में बिखराते!

    मेरे शैशव के मधु में घुल
    मेरे यौवन के मद में ढुल
    मेरे आँसू स्मित में हिल मिल
    मेरे क्यों न कहाते?
    - महादेवी वर्मा

  • _bahetiankita 3w

    होली

    बात है कुछ साल पहले की
    जब खेलने होली मैं थी पिहर चली
    मेरे बचपन का मित्र मुझे मिला
    ढेर सी बातें, यादें, पुराने किस्से, ठिठोली का चला सिलसिला
    बातों बातों में मोहल्ले के होली कार्यक्रम का उसने निमंत्रण दिया
    मैं तो होली मनाने ही आई थी सो झट से मैंने हां कह दिया
    दो दिन बाद परिवार संग मोहल्ले में खोली खेलने मैं भी चली
    वहां मित्र के साथ उसकी बिटिया और पत्नी भी मिली
    सबके चेहरे लाल,पीले,गुलाबी,हरे,नीले रंगों में रंग गए
    सब होली खेल कर, मानो एक से हो गए
    फिर चला पड़ा खाने-पीने का दौर
    गुझिया, नमकीन, मिठाई एक तरफ और ठण्डाई एक ओर
    पर कुछ लोगों ने की शरारत
    मित्र को ठण्डाई में भांग मिला के पिला दिया गटागट
    बस फिर जो हुआ वो अजब था
    मित्र ने हमारे ढाया गजब था
    जा टकराया वह अपनी पत्नी से
    समझा पत्नी नहीं, उसकी बचपन की सखी है
    भांग और रंग में सराबोर वह बतियाने लगा
    कभी रो कर, कभी हंसकर पत्नी की कमियां गिनाने लगा
    अपने दुःख को साझा करने लगा
    पर सामने तो पत्नी थी, जो इतना कुछ सुनकर गुस्से में तनी थी
    चुपचाप वो वहां से घर पर चल दी
    अब तक तो ठीक था,असली शामत तो अब थी
    जब नशा उतरा वो बिना कुछ सुने जाने घर चल दिया
    घर पहुंचा तो वहां पर माहौल गर्म था,
    इससे पहले के पत्नी से भांग के नशे की मांगता
    उड़ता हुआ बेलन सर पर पड़ा
    फिर तो डंडे, झाडू, बरतनों की हुई बरसात,
    कितने विभिन्न प्रकार के बरतन होते हैं रसोई में उस दिन उसे हुआ ज्ञात
    बोली इतने दुखी हो मुझसे तो जाती हूं आज ही मायके
    फिर रहना यहां आराम से, करना चुगलियां यारों संग मिलके
    तब जाकर उसे कुछ-कुछ याद आया, नशे में उसने क्या या फरमाया
    माफी के लिए पत्नी के आगे नतमस्तक हुआ
    डाक्टर से मरहम-पट्टी का भी अलग खर्चा हुआ
    उस होली पर हुई गलती की सजा वो अब तक पा रहा है
    आज तक होली पर पत्नी से उल्हाने ताने खा रहा है
    रंगों से एलर्जी है, मीठे और ठण्डाई की बंदी है सबको यही बता रहा है।
    ©_bahetiankita

  • _bahetiankita 4w

    शिशु

    शिशु जग में आने से पहले ही बन जाता है मां का अभिन्न हिस्सा,
    बनती है एक खुबसूरत कहानी जोड़ कर उसका हर छोटा बड़ा किस्सा,
    स्वेटर के साथ, भविष्य के सपने भी बुनने लगती मां,
    नौ माह के बेहद प्यारे सफर के बाद होती मुलाकात,
    वो पहली बार जब लेती शिशु को अंक में ,
    स्पंदित होता जीवन, मानो ऊर्जा भरती अंग में,
    वो पहला स्पर्श, अमृत दुग्धपान शिशु पाता,
    उस क्षण से ही दोनों के मध्य अनुपम रिश्ता जुड़ जाता,
    सारा संसार मां के लिए बदलने लगता,
    शिशु नित नई अनूठी अठखेलियां करने लगता,
    धीरे धीरे प्रतिदिन शरारतें बढ़ने लगती,
    हंसना रोना, और सबसे प्यारी कुटिल मुस्कान घर की शान बनने लगती,
    अबोध शिशु हर कुटिलता, हर स्वार्थ, हर बुराई से दूर,
    पल में रूठता, पल में खुद मान जाता, प्रेम सुगंध फैलाता भरपूर,
    सिखाता सबको बैर ना मन में पालो, जी भर के खेलो और खाओ,
    खुल के अपनी भावनाएं दर्शाओ, व्यापार ना रिश्तों में लाओ,
    उसकी वो पहली चोट, बिमारी, सुई पर रोती मां,
    संग उसके हंसती, उसकी हर पहली (बोलना, चलना) याद को संजोती मां,
    जग की सबसे सुंदर निश्चल अप्रतिम श्रेष्ठ कृति है शिशु,
    निष्काम, निःसंदेह निःस्वार्थ अनुभूतियों का जीवंत उदाहरण है शिशु।
    ©_bahetiankita