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ईशु शर्मा❤ 19✍

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  • ______i 2d



    वो बैठा रहा मेरी दहलीज़ पर फकीर बनकर,
    मैं खामखा भटकता फिरा
    उसके लिए मंदिर-मस्जिदों में।

    ©ईशु शर्मा

  • ______i 1w

    रावण✍

    दशहरे के अवसर पर लोग रावण को जलाने जाते हैं,
    जला तो आते हैं उसे पर उसकी बुराईयाँ संग ले आते हैं।

    रावण ही थे वो जिन्होंने सीता माई को छुआ नहीं,
    वो तो तर गए श्री राम के हाथों,
    पर कलयुगी पापियों का कुछ हुआ नहीं।

    रावण ही थे वो जो अपना अपमान कभी न सह सके,
    आधुनिक अंधभक्त नेताओं से बेहतर थे,
    जो सब कुछ देखकर भी न कुछ कह सके।

    पापियों की संख्या बढ़ रही है,ईमानदारियों का क्या होगा,
    बाहरी रावण को जलाते फिरते हो,
    तुम्हारे भीतर के रावण का क्या होगा?

    खेल बनाकर रख दिया भगवान राम के त्योंहार को,
    उल्टे-सीधे नाटक कर,मजाक बना दिया रावण संहार को।

    झांकियाँ निकली राम की कहीं रावण नाचे सीता संग,
    शर्म आने लगी है देखकर,भारतीय संस्कृति हो रही है भंग।

    ये जो दुनिया के समक्ष रावण की छवि बनाई है,
    ये रावण की छवि नहीं,तुमने अपनी मानसिकता दिखलाई है।

    प्रभु भी होंगे दुविधा में ये कैसी दुनिया बनाई है,
    लोगों के भीतरी रावण को देख,
    आज रावण को भी लज्जा आयी है।

    राम बनने को बहुत बैठे,तुम भटक दूर तक जाओगे,
    राम तो बन बैठोगे तुम,राम राज्य कहाँ से लाओगे?


    ©ईशु शर्मा

  • ______i 2w

    क्या ये समय सबकी ज़िंदगी में आता है?
    या ये सब सिर्फ़ मेरे साथ ही होता है?
    @hindiwriters
    @alkatripathi79
    @dipps_
    @anusugandh
    @man_ki_pati

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    मेरी खुद से ज़्यादा फ़िक्र करने वालों को,
    अब मेरा ज़िक्र करना भी पसंद नहीं।

    ©ईशु शर्मा

  • ______i 2w

    कड़वा सच✍

    कल एक खबर आई अखबारों में,
    फ़िर सरेआम गिरे ज़मीर बाज़ारों में,

    बेटी ने निकाला माँ को घर से,
    कहने लगी वह अपने वर से,
    मैं अकेली नहीं कर पाती काम,
    तेरी बुढ़िया माई हो रही है हराम,
    खड़ा बेटा चुपचाप सुन रहा था कटुशब्द,
    बिन बोले वह तब हो रहा था निःशब्द।

    माई की थी उम्र बयासी,
    हाए राम ये कैसी पूर्णमासी,
    माई बेचारी थी उपवासी,
    सुबह से थी वह भूखी-प्यासी,
    व्यथा किसे सुनाती बेचारी,
    तन-मन से वह थी लाचारी।

    बेटा बोला चलो वृद्धाश्रम तुम्हें छोड़ मैं आऊँगा,
    फ़िर अपनी पत्नी के संग किसी और शहर बस जाऊँगा,
    सुनते ही पत्नी ये सब मन ही मन मुस्काई,
    माँ झुकाकर सिर सोचे,प्रभु ये कैसी घड़ी आई।

    बेटा बोला कुछ खा तो लो तुम सुबह से भूखी-प्यासी हो,
    बहू बोली भूखी ही रहो तुम तो एक सन्यासी हो,
    वृद्धाश्रम जाकर खाना वहाँ तुम्हें पकवान मिलेंगे,
    काम कर लेना वहाँ जाकर,वहाँ नहीं ये आराम मिलेंगें।

    माई बैठी थी धरती पर,
    घोर अनर्थ था होने वाला,
    बयासी साल की माता ने,
    सुबह से न खाया एक निवाला।

    बेटे ने दिया सहारा माँ को खड़े हो जाने को,
    माँ बेचारी हुई बेचैन बेटे को गले लगाने को,
    माँ लगी जब गले लगाने अपने पुत्र धन को,
    बहु ने चुपके से धक्का दे दिया,
    बूढ़ी माई के तन को।

    माँ को माँ न समझा जब किसी माँ की जाई ने,
    धरती पर गिरते ही तब प्राण त्याग दिए माई ने।

    महीने बीते,साल बीते,जब पुत्र धन को लगे तरसने,
    माँ की आसीसें याद कर तब बेटे की आँखें लगी बरसने,
    दिन चढ़े,दिन ढले,जब कुछ दिनों के बाद,
    बोली बहु पकवान ले आना आज माई का है श्राद्ध,
    जो-जो था माई को पसंद वो सब ले आना जी,
    मैं भी मन से बना रही हूँ माई की पसंद का खाना जी।

    जब माई खुश होकर देगी पुत्र रत्न का आशीर्वाद,
    तब हमारा घर खुशी से पूरी तरह हो जाएगा आबाद।

    वाह!अब माँ-बाप याद नहीं रहते,
    उफ्फ़ ये कैसी जवानी है,
    ये इनकी ही नहीं कही मैंने,
    आज ये हर दूसरे घर की कहानी है।

    ©ईशु शर्मा

  • ______i 3w



    चल मैंने तो सब कुछ अनदेखा कर दिया,
    पर ऊपर वाला सब देख रहा है मेरे दोस्त।

    ©ईशु शर्मा

  • ______i 3w



    एक दरख़्वास्त है,
    आस्तीन के साँपों से,
    बेशक़ मुझे भूल जाओ,
    पर अपनी औकात याद रखना।

    ©ईशु शर्मा

  • ______i 3w



    भीगना पड़ता है,
    अश्रुओं की बारिशों में बेपनाह,
    ये मोहब्बतें यूँही नहीं पनपती जनाब।

    ©ईशु शर्मा

  • ______i 3w

    पानी से मोती❤

    जब मेरे अंदर से आवाज़ आयी अकेले बैठकर,
    तब मैं सुलझाने लगी ज़िंदगी के झमेले बैठकर।

    कर सकती हूँ बहुत कुछ पर कर नहीं पाती हूँं,
    वज़ह यही है शायद कि मैं स्त्री जाति हूँ।

    जब करने लगूँगी तो बस कुछ कर ही जाऊँगी मैं,
    कोशिश यही रहेगी मेरी,
    सबकी परेशानियाँ दूर भगाऊंगी मैं।

    मैं चाहती हूँ मेरी जिंदगी में बहुत बेहतरीन लोग आएं,
    जब खुद न कर पाऊँ मैं खुदपर,
    तब वो मुझ पर विश्वास कर जाएं।

    ऐसी बनूं मैं न मेरे बारे किसी के मुख पर निंदा रहे,
    मैं मिट जाऊं पूरी तरह बेशक,पर मेरा वज़ूद जिंदा रहे।

    यहाँ दुःख दर्द की आग सभी लोग सेकते हैं,
    रुकावटें कोई नहीं देखता ज़माने में,
    यहाँ सब परिणाम देखते हैं।

    निष्ठा बनी रहे मेरी प्रभु में,मैं न किसी से अंजान रहूँ,
    मन की मैल मिट जाए बस,मैं न ज़रा भी बेईमान रहूँ।

    सहारा बनूं मैं सबका, अँधों के लिए मैं ज्योति बनूं,
    ऐसी शख्सियत बनाना प्रभु,मैं पानी से मोती बनूं।

    ©ईशु शर्मा

  • ______i 3w



    शायद जीत किस्मत में नहीं
    और हार जाना मेरे उसूलों में नहीं।

    ©ईशु शर्मा

  • ______i 3w

    @hindiwriters
    जैसे आसमान में बारिश के बाद सफ़ेद बादल छा जाते हैं,मेरी ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है।

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    हाल कुछ सफ़ेद बादलों-सा है मेरा,
    ज़रा से आँसू क्या निकले और मैं बेरंग हो गयी।

    ©ईशु शर्मा